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दृ॒शा॒नो रु॒क्मऽउ॒र्व्या व्य॑द्यौद् दु॒र्मर्ष॒मायुः॑ श्रि॒ये रु॑चा॒नः। अ॒ग्निर॒मृतो॑ऽअभव॒द् वयो॑भि॒र्यदे॑नं॒ द्यौरज॑नयत् सु॒रेताः॑ ॥२५ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दृ॒शा॒नः। रु॒क्मः। उ॒र्व्या। वि। अ॒द्यौ॒त्। दु॒र्मर्ष॒मिति॑ दुः॒ऽमर्ष॑म्। आयुः॑। श्रि॒ये। रु॒चा॒नः। अ॒ग्निः। अ॒मृतः॑। अ॒भ॒व॒त्। वयो॑भि॒रिति॒ वयः॑ऽभिः। यत्। ए॒न॒म्। द्यौः। अज॑नयत्। सु॒रेता॒ इति॑ सु॒ऽरेताः॑ ॥२५ ॥

यजुर्वेद » अध्याय:12» मन्त्र:25


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हिन्दी - स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को क्या-क्या जानना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम लोग (यत्) जिस कारण (दृशानः) दिखाने हारा (रुक्मः) रुचि का हेतु (श्रिये) शोभा का (रुचानः) प्रकाशक (दुर्मर्षम्) सब दुःखों से रहित (आयुः) जीवन करता हुआ (अमृतः) नाशरहित (अग्निः) तेजस्वरूप (उर्व्या) पृथिवी के साथ (व्यद्यौत्) प्रकाशित होता है, (वयोभिः) व्यापक गुणों के साथ (अभवत्) उत्पन्न होता और जो (द्यौः) प्रकाशक (सुरेताः) सुन्दर पराक्रमवाला जगदीश्वर (यत्) जिस के लिये (एनम्) इस अग्नि को (अजनयत्) उत्पन्न करता है, उस ईश्वर, आयु और विद्युत् रूप अग्नि को जानो ॥२५ ॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य गुण-कर्म और स्वभावों के सहित जगत् रचनेवाले अनादि ईश्वर और जगत् के कारण को ठीक-ठीक जान के उपासना करते और उपयोग लेते हैं, वे चिरंजीव होकर लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं ॥२५ ॥
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संस्कृत - स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्नरैः किं किं वेद्यमित्याह ॥

अन्वय:

(दृशानः) दर्शकः (रुक्मः) (उर्व्या) पृथिव्या सह (वि) (अद्यौत्) प्रकाशयति (दुर्मर्षम्) दुर्गतो मर्षः सेचनं यस्मात्तत् (आयुः) जीवनम् (श्रिये) शोभायै (रुचानः) प्रदीपकः (अग्निः) तेजः (अमृतः) नाशरहितः (अभवत्) (वयोभिः) व्यापकैर्गुणैः (यत्) यस्मात् (एनम्) (द्यौः) स्वप्रकाशः (अजनयत्) जनयति (सुरेताः) शोभनानि रेतांसि वीर्याणि यस्य सः ॥२५ ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्याः ! यूयं यद्यो दृशानो रुक्मः श्रिये रुचानोऽमृतो दुर्मर्षमायुः कुर्वन्नमृतोऽग्निरुर्व्या सह व्यद्यौद्, वयोभिः सहाभवत्, तद् द्यौः सुरेता जगदीश्वरो यदेनमजनयत्, तं तत् तां च विजानीत ॥२५ ॥
भावार्थभाषाः - ये मनुष्या जगत्स्रष्टारमनादिमीश्वरमनादिजगत्कारणं गुणकर्मस्वभावैः सह विज्ञायोपासत उपयुञ्जते च ते दीर्घायुषः श्रीमन्तो जायन्ते ॥२५ ॥
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मराठी - माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जी माणसे गुण, कर्म स्वभावासह जगाची रचना करणाऱ्या अनादी ईश्वराला जाणतात व उपासना करतात, तसेच जगाचे कारण योग्य प्रकारे जाणून अग्नी वगैरेचा योग्य प्रकारे उपयोग करून घेतात ते दीर्घायू होऊन लक्ष्मी प्राप्त करतात.